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कामरेडो को मूर्तिपूजा नही आती - श्री माधव कृष्ण जी का 'काव्य-संग्रह'

  • लेखक की तस्वीर: अर्चना श्रीवास्तव
    अर्चना श्रीवास्तव
  • 8 जुल॰ 2025
  • 1 मिनट पठन
कामरेडो को मूर्तिपूजा नही आती
कामरेडो को मूर्तिपूजा नही आती

हार्दिक आभार व्यक्त करती हूं- श्री माधव कृष्ण जी को जिन्होनें अपनी 'काव्य-संग्रह' 'कामरेडो को मूर्तिपूजा नही आती' अवलोकनार्थ हेतू दिया | मैं पढी, हर कविता अपने-आप में यथार्थ के धरातल से जुड़ी और भावपूर्ण है।

         इसमें समाज की कुरितियों का बहुत ही जीवंत चित्रण है | धर्म ,समाज, देश, गरीबी, राजनीति या साहित्य सब पर गहराई से चिंतन-मनन किया है ।

         लेखक के हृदय की वेदना जो कमजोर वर्ग के लिए है, मुझे भी व्यथित कर गयी ।

         कुछ कविताएं जो मुझे बहुत पसंद आयी उसकी कुछ पंक्तियों को साझा कर रही हूं , इस उम्मीद के साथ की आप-सभी को भी पसंद आयेगा...........


'मां'-

हे,सबल,निष्कपट ,सत्यनिष्ठ,

मेरी मां, मेरी जननी!

मेरी मां ! तुम केवल भूखण्ड नही ।


'बुद्ध और बम'-

इस बम से नही जन्मा युद्ध,

इस बम से सृजित हुआ बुद्ध,

गढता हुआ अस्तित्व की नयी परिभाषा।


'धर्म का यथार्थ'-

मुझे तो लगा था, इंसान बनने का,

या ,फिर मन शुद्ध हेाने का

करम निष्काम करने का ।

हजारों आवरण से निकलकर ,

सच को पकड.ने का ।


'तुम साथ हमेशा थे'-

जब थका,

रुका,

चिंता रेखा मिट गयी

साथ तुमको देखा ।


इसके अलावा - 'साहित्य संचालक', 'बहुत कुछ होना’, 'उलझन', 'बिटिया', 'प्रकृति से परे', 'मंदिर-मस्जिद', 'पूर्णता', 'प्रतिक्षा'।


सभी कविताएं पढ़ने के बाद अन्तरमन में कुछ प्रश्न छोड़ जाती है, सोचने पर विवश होता है, मन।

निरन्तर कर्मपथ पर अग्रसर रहे माधव कृष्ण जी, शुभकामनाओं के साथ।

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